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धरती की गोद

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sanjay kumar garg


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बलवान बनो!! (लघु कथा)

Posted On: 18 Jul, 2014  
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Others social issues मस्ती मालगाड़ी लोकल टिकेट में

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ऊबकाई (लघु कथा)

Posted On: 10 Jun, 2014  
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अफवाहों का मनोविज्ञान!

Posted On: 24 May, 2014  
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Others social issues मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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ஜெனில்,மனிதர்கள் அனைவரும் சமமே ,ஆனால் ஆண்கள் ஆடை அணிவதிலும் பெண்கள் ஆடை அணிவதிலும் àÂ³šÃ Â®Â®Ã Â®®®Ã Â®Â¾Ã Â®Â©Ã Â®ÂµÃ Â®Â°Ã Â¯ÂÃ Â®Â•Ã Â®ÂÂா?கவர்சà¯ÂÂசி பொருட்களாக கருதப் à001000®ªà®Ÿà¯à®Ÿà¯ வந்த பெண்களை மனுசிகளாக மாற்றியதே இஸ்லாம் தான் .அடுத்து பர்தா என்பது நடைமுறையில் உள்ளது மட்டும் அன்று.தனது கவர்ச்சி உறுப்புகளை பிறரை கவராத வண்ணம் எவ்விதமான ஆடைகளைக் கொண்டும் முகமும் கைகளும் தவிர மறைத்துக் கொள்வதே ஆகும் .அரைகுறை ஆடை அணிந்த பெண்களே அதிக வன்புணர்ச்சிக்கு பலியாகியுள்ளனர் என்பது உலகம் அறிந்த உண்மை.இப்போது அதை மாடன் வேர்ல்ட் என்னும் பர்தாவால் மறைக்க வேண்டாம்

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आदरणीय संतलाल जी, सादर नमन! व्यास नदी की दुर्घटना ने जनमानस को हिला कर रख दिया था, उस पर जारी वीडियो ने आग में घी का काम किया, साथ ही ये वीडियो हमारे समाज में बढ़ती असंवेदनशीलता का भी घोतक है, कोई मर रहा है, कोई मरते हुए की वीडियो ग्राफी कर रहा है! अरे कुछ नहीं कर सकते ईश्वर से प्रार्थना तो कर ही सकते हो? आदरणीय संतलाल जी! समाज की किसी घटना-दुर्घटना को हर संवेदनशील मस्तिष्क अपनी-अपनी मानसिक स्थिति के अनुसार व्यक्त करता है, कोई संवेदना व्यक्त करता है, कोई समाज को उन दुर्घटनाओं से बचने के उपाय सुझाता है, वहीं लेखक एक रचना रचता है! ये मेरी कथा इस भयानक दुर्घटना पर मेरी मानसिक स्थिति का परिचायक है! आपका प्रेरणास्पद कमेंट्स निश्चित ही मेरा उत्साह वर्धन करेगा और मुझे अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करेगा! धन्यवाद! सर!

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के द्वारा: nishamittal nishamittal

आपने जैसे मेरे विचारों को ही श्रंखला वद्ध कर प्रस्तुत कर दिया है.... सभी प्रसिद्ध विचारकों के विचार प्रासंगिक हैं... .....ये सब क्या है? क्या ये हमें ‘र्इश्वर’ प्रदत्त उपहार नहीं है, कि एक की न्यूनाधिकता को दूसरा पूर्ण कर देता है?......उसे पुरुषों के बराबर का दर्जा क्यों नहीं देना चाहते?.... वास्तविकता जरा सी हटकर अवश्य है- जैसा आपने भी लिखा है  हनारे पौराणिक इतिहास में सदैव जोड़े में दोनों समानता से पूज्य उल्लेखित हैं... आज की नारी भी समानता पर ही है....  उसका संघर्ष समानता का है ही नहीँ वरन विशिष्टता का है.... और वह वैशिष्ट्य पा भी लेगी.... क्योंकि हम सब ऐसा ही चाहते हैं.... वैसे एक आध्यात्मिक और वैज्ञानिक प्रमाणिक तथ्य यह है कि संसार का प्रत्येक मनुष्य  आज भी अर्धनारीश्वर ही है... विचारों से किसी में स्त्रीत्व का आधिक्य है तो किसी में पुरुषत्व का....

के द्वारा: Charchit Chittransh Charchit Chittransh

आदरणीय संजयजी,इस बहुत अच्छे लेख के लिए बहुत बहुत बधाई,सुबह दैनिक जागरण में कुछ अंश पढ़ा था.ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं-shiv2नारी व नारीत्व पर अनेक विचार, विचारकों ने व्यक्त किये हैं, उनमें से अधिकतर उसे ‘देवी’ बनाकर सिर पर बैठाना चाहते हैं, या फिर ‘जूती’ समझकर पैरों में पहनना चाहते हैं, उसे पुरुषों के बराबर का दर्जा क्यों नहीं देना चाहते? वास्तव में स्त्री-पुरूष विश्व रूपी अंकुर के दो पत्ते हैं।1 स्त्री-पुरूष परस्पर ‘पूरक’ हैं ‘प्रतिस्पर्धी’ नहीं। एक के अभाव में दूसरा अपूर्ण है। दोनों में से कोर्इ भी, अपने आप में सम्पूर्ण नहीं है, सम्पूर्णता के लिए उन्हे एक दूसरे का सहारा अवश्य लेना होगा।

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

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बहुत सही कहा है- “मौन साधना” में लीन जब “लेखक” किसी ‘विषय-विशेष’ पर गहरार्इ से चिंतन करता हैं तो उसका ‘सुपरचेतन मन’ सुदूर अंतरिक्ष में मंडरा रही उस ‘विषय-विशेष’ से संबंधित घटनाओं को अपनी ‘चुम्बकीय शक्ति’ से आकृषित करके उनसे तदात्म स्थापित कर लेता है, जिससे नर्इ-नर्इ बातें उस ‘विषय-विशेष’ के संबंध में उसके ‘मानस-पटल’ पर अंकित होती चली जाती है और “लेखक” एक “उत्कृष्ट-रचना” को जन्म देने की स्थिति में आ जाता है।ध्यान की अनन्त गहराईयों में डूबा हुआ “लेखक” कभी-कभी “भविष्य” से भी तदात्म स्थापित कर लेता है।" आदरणीय संजयजी,बहुत सुंदर सार्थक शिक्षाप्रद और उपयोगी रचना.इस उत्कृष्ट रचना के सृजन के लिए आपको बहुत बहुत बधाई.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय विजय भाई जी, सादर नमन! मैंने ये ब्लॉग नये साधको को दृष्टिगत रखते हुए लिखा है, नए साधक यदि छोटी चीज पर एकदम ध्यान केंद्रित करेंगे तो उन्हें आँखों में परेशानी हो सकती है! सबसे बेहतर ये है, कि हम सफ़ेद कागज पर एक रूपये के आकार का गोल घेरा बना ले, उसके बाद उसके अंदर क्रमश अठ्ठन्नी, चवन्नी, बटन, बिंदु (चावल के चौथाई भाग के बराबर) का गोल निशान पीले रंग से बनाते चले जाये! नए साधक पहले रूपये के आकार पर कुछ दिनों तक अभ्यास करे, अभ्यास मजबूत हो जाने पर, फिर उसे छोटे आकार पर धीरे-धीरे आते चले जाए, अर्थात "दीर्घ से लघु से लघुतम पर"! एकदम छोटे आकार पर ध्यान केन्दित करने का प्रयास न करें! आप चूँकि त्राटक साधना कर चूंके है, इसलिकए आपको ये आकार बड़ा लग रहा है! "जिज्ञासमय कमेंट्स" के लिए आभार विजय भाई जी!

के द्वारा: sanjay kumar garg sanjay kumar garg

संजयजी,बहुत बहुत बधाई.बहुत सार्थक,उपयोगी और शिक्षाप्रद लेख.दो सावधानिया आपने बता दी हैं--जिसकी ‘नेत्र-ज्योति’ ज्यादा कमजोर हो या जो हमेशा चश्मा लगाते हों,उनको बाह्य त्राटक नहीं करना चाहिए बल्कि वे किसी भी आसन में बैठकर या श्वासन में लेटकर, भूमध्य, ह्रदय की धड़कन या किसी “वस्तु-विशेष” का “मानसिक ध्यान” या ”आन्तर-त्राटक” करें.दूसरी सावधानी भी आपने लेख में बता दी है- पित्त-प्रकृति’ वाले व्यक्तियों को ‘सूर्य-त्राटक’ (उगते हुए सूर्य का ध्यान) तथा ‘कफ-प्रकृति’ वाले व्यक्तियों को ‘चंद्र त्राटक’ नही करना चाहिए.मुझे बहु प्रसन्नता हुई.ऐसे विषय पर बहुत कम लोग लिखते हैं.लोग आपका लेख पढ़ें और लाभन्वित हों,यही मेरी शुभकामना है.एक बार फिर से इस लेख के लिए बधाई.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: Acharya Vijay Gunjan Acharya Vijay Gunjan

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के द्वारा: विजय कुमार सिंघल विजय कुमार सिंघल

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