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धरती की गोद

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होती नहीं कबूल दुआ 'तर्के-इश्क' की.....

Posted On: 5 Dec, 2013 Others,social issues में

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pray5पाठकजनों!! ये घटना मेरे जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है, जिसने साबित कर दिया था कि ‘र्इश्वररूपी’ एक ‘सर्वशक्तिमान सत्ता’ की उपस्थिति से इन्कार नहीं किया जा सकता, जो ‘विराट परमात्मा’ के सूक्ष्म अंश ‘आत्मा’ के रूप में हमारे शरीर में व्याप्त है।

मैं सपरिवार शादी में जाने की तैयारी कर रहा था। तभी हमने देखा मेरा दो साल का बेटा ”वंश” घर में नहीं है।

हर कमरे, मेज के नीचे, छत पर, पर्दे के पीछे, हर जगह देख लिया घर में कहीं भी वंश नहीं था! पड़ोसियों के यहां देखा, वहां भी ‘वंश’ नहीं था! मेरा मन का विश्वास रूपी दीपक धीरे-धीरे बुझने लगा। आखिर बेटा कहां चला गया?

तभी मुझे कुछ माह पहले की घटना याद आ गर्इ। जब मैंने अपने पुश्तैनी प्लाट पर कब्जा जमाये बैठे भू-माफियाओं को अपने ‘दबंग मित्रों’ की सहायता से, बल-प्रयोग द्वारा न केवल खदेड़ दिया था, बल्कि अपने प्लाट की चार-दीवारी कराके अपने स्थायी स्वामित्व में ले लिया था। जिससे वो मुझ से दुश्मनी मानने लगे थे। मुझे लगा कि उन ‘भू-माफियाओं’ ने मेरे बेटे को ‘अगवा’ कर लिया है।

मैंने तुरन्त अपने परिचित ‘रघु चाचा’ को फोन किया। 70 साल के रघु चाचा की छवि शहर में एक दबंग नेता व समाजसेवी की है। ‘दण्ड-भेद’ की नीति मैं उनकी सलाह के बिना नहीं अपनाता था।

चाचा ने कहा-मैं अभी आ रहा हूँ,  जल्दबाजी मत करना!

उसके बाद मैंने पुलिस को भी फोन कर दिया!

मैं परेशान था, बार-बार बच्चे का मासूम चेहरा आंखों के सामने आ रहा था, पता नहीं वो कैसा होगा और कहां होगा? दुख: और गुस्सा मुझ पर हावी होता जा रहा था। मैं तुरन्त अपने स्टडी रूम की तरफ बढ़ा और अपनी गन लोड करके वही बैठ गया। मैंने बच्चे को खोजने के लिए ‘भू-माफियाओं’ के पास जाने का निश्चय कर लिया था.

मैं मन ही मन र्इश्वर! से प्रार्थना करने लगा, हे र्इश्वर!! इस संसार-रूपी संघर्ष में भले ही मैं विजय रहूँ या पराजित हो जाऊं, परन्तु हमारे अंश, ”वंश” व् परिवार की रक्षा करना! पाठकजनों!! कभी-कभी कातरता व व्याकुलता से लगार्इ गर्इ पुकार, आत्मा से निकल कर सीधी परमात्मा तक पहुँच जाती है, और वो इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि उससे र्इश्वर रूपी ‘सर्वशक्तिमान’, ‘सर्वव्यापी सत्ता’ का ‘सिंहासन’ हिल जाता है! भले ही र्इश्वर! स्वयं ना आये, परन्तु कभी बन्दों (सहायकों) के रूप में, तो कभी आत्मा की आवाज के रूप में, तो कभी अतीन्द्रिय दृष्टी के रूप में अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज कराता है! वो अलग बात है, कि कभी-कभी हम उस की ‘आवाज’ को पहचान नहीं पाते! ऐसा मेरा ही नही, र्इश्वरानुरागी भक्तों का कथन भी है!

तभी मेरे अन्दर से आवाज आयी-”जल्दी मत कर ‘संजय’ और देख ले?”

”अरे आसमान में देखूं या जमीन में”-मैंने मन नही मन गुस्से से कहा!

अरे! बच्चे को एक बार आवाज लगा कर तो देखो? मेरे अन्दर से फिर आवाज आर्इ!

मैं ‘तारा रानी’ का पति ‘राजा हरिशचन्द्र’ नहीं हूँ, जिसकी आवाज पर उसका ‘मृत बच्चा’ और ‘घोड़ा’ दौड़े चले आये थे- मैंने मन ही मन झल्ला कर कहा!

मैं मैन गेट खोलकर बाहर आ गया, ‘अन्दर’ से फिर आवाज आयी। अब मैंने ‘आत्मा’ की आवाज को मानते हुए, अपने रूधे गले सेे बच्चे को आवाज लगार्इ!

वंशु! बेटा तुम कहां हो! मैं बज्जी जा रहा हूँ, आइस्कीम लेने, क्या तुम मेरे साथ चलोगे?

मेरी आंखों में आंसू आ गये। मेरीे पत्नी और बेटियां भी रोने लगी। मैंने तेजी से गेट का कुन्दा पटक कर बन्द कर दिया और जैसे ही आगे बढ़ा। मुझे अपने बेटे की आवाज सुनार्इ दी।

पापा!! मैं आऊंम आइस्कीम बज्जी!

मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, मैं वहाँ से जाना ही चाहता था, कि बेटी की तेज आवाज आयी?

पापा! वंशु! ये रहा! जैसे मेरी तन्द्रा  भंग हो गयी थी, मुझ को विश्वास नहीं हो रहा था। वापस आया वंश अपनी मम्मी की गोद में अपनी चिरपरिचित शरारती मुस्कान के साथ था, मुझे देखकर उसने अपने दोनों हाथ मेरी तरफ बढ़ा दिये।

पाठकजनों!! आप विश्वास नहीं करेंगे, बच्चा मेरे ‘मन की गहरार्इ’ रूपी ‘स्कूटर कवर’ में अपनी ‘पुरानी यादों’ की तरह सहेजे गये ‘पुराने स्कूटर’ के अन्दर गददी और हैंडल के बीच में जो स्थान होता है, उसमें बैठा हुआ था। स्कूटर के ऊपर कवर ढका हुआ था। भला, ऐसी जगह किसका ध्यान जा सकता था?

pray2‘बालमनोविज्ञान’ व ‘अध्यात्म’ के जिज्ञासु पाठकों के लिए ये एक महत्वपूर्ण प्रश्न हो सकता है, कि दो साल का बच्चा, ऐसे दम साधे 8-10 मिनट तक कैसे बैठ सकता है, कि वो आवाज लगाने पर भी जवाब न दे? क्या यह ‘र्इश्वरीय प्रेरणा’ थी, या ‘बालमनोविज्ञान’ का एक अनोखा रूप?

यदि यह ‘बालमनोविज्ञान’ का एक रूप था, तो मुझे अपने ‘अन्दर’ से बच्चे को आवाज लगाने की प्रेरणा किसने दी? यदि समय रहते यह ‘अन्तप्रेरणा’ नहीं मिलती और मैं ‘सशस्त्र’ भू-माफियाओं से बच्चे का अपहरणकर्ता समझ का उलझ जाता तो परिणाम क्या होता?

पाठकजनों!! मेरा मानना है कि ‘र्इश्वर’ ‘इन्सान’ के विश्वास व धैर्य की परीक्षा युगों-युगाें से लेता आ रहा है। किसी युग में ‘राजा हरिश्चन्द्र’ की परीक्षा लेता है, तो किसी युग में ‘आपकी और ‘मेरी’ परीक्षा लेता है। संसार रूपी शतरंज की बिसात पर ‘एकाकी’ खेल रहा ‘र्इश्वर’, केवल मुहरा (इन्सान) या परिस्थितियां  रूपी ‘खाने’ बदलता है। युगों युगों से ‘अविनाशी’ र्इश्वरीय सत्ता ‘एक’ वहीं है!

अचानक गेट खुला रघु चाचा दो साथियों के साथ घर में दाखिल हुए, बच्चे को देखकर मुझ से बोले मिल गया ना बेटा! हम कह रहे थे, परेशान मत होना। अरे! तेरे ‘रकीब’ भी जानते हैं, कि तू ‘खुदा’ और उसके ‘बन्दों’ की सख्त हिफाजत में है, वो तेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। मैंने मुस्करा कर उनका अभिवादन किया और उन्हे अपने स्टडी रूम में ले कर चल दिया।

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‘हाली’ साहब के एक ‘शेर’ के साथ अपना ‘ब्लॉग’ समाप्त करता हूँ-

होती    नहीं    कबूल    दुआ  ‘तर्के-इश्क’   की,

जब दिल ही साथ ना दे, तो जुबां में असर कहां।

तर्के-इश्क: संशयात्मक प्यार

(यह एक सत्य घटना है, स्थान, पात्र काल्पनिक हैं।)

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