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धरती की गोद

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लघु कथा-जवानी बनाम बुढ़ापा (Contest)

Posted On: 7 Jan, 2014 Others,Contest में

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javani auy bud1

जेठ की दोपहर, भरी हुर्इ रोडवेज की बस, सारे यात्री पसीने से नहाये हुए हैं। जितने यात्री बैठे हुए हैं, उतने ही खड़े हैं। गर्मी में ठंडी आहे भरते यात्री, जल्दी से जल्दी गंतव्य पर पहुंचना चाहते हैं।
गाड़ी एक स्टापेज पर रूकी, वहां से एक वृद्धा गाड़ी में चढ़ने का प्रयास करने लगती है।
कन्डक्टर, ड्राइवर पर चिल्लाया-”कहाँ गाड़ी रोक दी तैने, अब इस बुढि़या को बस में चढ़ाने के लिए भी चार आदमी चाहिएगे!”
तभी एक संभ्रांत व्यकित वृ़द्धा को सहारा देकर गाड़ी में बैठा लेता है। बस में चढ़ते ही वृद्धा ने अपने पोपले मुंह व लड़खड़ाते पैराें से सभी को उम्मीद की नजरों से देखा। परन्तु जहां भी उसकी दृष्टि जाती, वहीं नजर इधर-उधर देखने लगती। आखिरकार वृद्धा बस के फर्श पर ही बैठ गयी और झूर्रीदार हाथों से, अपना पसीना पौंछने लगी।

गाड़ी पुन: आगे बढ़ी और फिर दूसरे स्टॉप पर रूक गयी। जितने यात्री उतरते, उतने ही बस में चढ़ जाते। तभी गाड़ी में पश्चिमी-परिधान से सुसज्जित एक नवयुवती दाखिल हुर्इ, तेज परफ्यूम की खुशबू बस में छितरा गर्इ। पता नहीं ये बहार के आगमन का संकेत थी या फिर भारतीय संस्कृति के पतझड़ का? बस में सवार यात्रियों के बूढ़े-जवान तीर उस के शरीर से टकराने लगे।
नवयुवती कन्डक्टर की सीट के बराबर में खड़ी हो गयी और गहरी सांस खिंचती हुर्इ, रूमाल से पसीना पौंछने लगी।
उस मेघ-मृणालिनी को देख कर कन्डक्टर का बूढ़ा मयूर-मन नाचने लगा।
कन्डक्टर तुरन्त सीट से उठ गया, और बोला!
मैडम! आप यहां बैठिए!
परन्तु, अंकल! आप टिकट कैसे बनायेंगे? नवयुवती बोली।

कोर्इ नहीं, मैं बस में घूम कर टिकट बना लूंगा, मुझे आदत है, प्लीज! आप बैठिये और कन्डक्टर, नवयुवती के शरीर को भद्दा-स्पर्श करते हुए खड़ा हो गया।
थैक्स! अंकल! नवयुवती सीट पर बैठ गयी और एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ, फोन की लीड कानों से लगार्इ और बस की खिड़की से बाहर की ओर देखने लगी।
“वृद्धा” बड़े गौर से अपनी गडडे में घुसी आँखों से सब देख रही थी, मानों कह रही हो!

javani auy bud3

जिन्दगी  भी  अजब  सरायफानी  देखी
हर चीज  यहां की आनी   जानी  देखी
जो   आके ना  जाये वो  बुढ़ापा  देखा
जो  जाके  ना  आये वो जवानी  देखी।

और गाड़ी पुन: आगे बढ़ गयी।

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Molly के द्वारा
November 5, 2016

Suprrisingly well-written and informative for a free online article.

rrr के द्वारा
May 29, 2014

ताला मे चाभी डाल द। अॉय हॉय करेजा 

Charchit Chittransh के द्वारा
March 16, 2014

मेरा ऐतराज है… आपके अन्याय ग्रसित पात्र के वृद्धा होने पर …. यह वृद्ध भी तो हो सकता था???

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 19, 2014

    आदरणीय चित्रांश जी, सादर नमन! ये एक सत्य कथा थी जिसे मैंने केवल कहानी का रूप दिया था, अब जब वास्तविकता में वो एक “वृद्धा” थी तो उसे मै “वृद्ध” केसे करता? ब्लॉग पर आने व् कमेंट्स करने के लिए सादर आभार चित्रांश जी!

    River के द्वारा
    July 11, 2016

    I’ve been loionkg for a post like this for an age

    Lynn के द्वारा
    November 5, 2016

    I was suggested it website by way of a aunty. I’m not positive whether or not it put up is without a doubt drafted by way of your ex boyfriend simply because nobody as well understand this type of special about a difficulty. Yoru;8217#&e wonderful! Thanks!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 16, 2014

बहुत बड़ा सच उजागर किया है ,संजय जी आपने ,ये रोज़ की बात है ,आपने बृद्ध, और बदसूरत लोगों के अनुभवों को बेहतरीन तरीक़े से व्यक्त किया है ,दोहरी बधाई , सादर , निर्मल

    sanjay kumar garg के द्वारा
    February 17, 2014

    आदरणीया निर्मला जी, सादर नमन! कहानी पसंद करने व् ब्लाक पर कमेंट्स करने के लिए सादर आभार!

harirawat के द्वारा
January 29, 2014

गर्ग जी ये घटनाएं रोज हरेक के साथ घटती है, हर एक के घर में दादी हैं दादा हैं, उनको तो उन्हें आदर देना ही होता है, लेकिन जब ये ही लोग बस में ट्रेन में मेट्रो में सफ़र करते हैं तब इनका विवेक कहाँ जाता है ? बहुत सुन्दत प्रस्तुति के लिए धन्यवाद ! हरेन्द्र जागते रहो

    sanjay kumar garg के द्वारा
    January 29, 2014

    आदरणीय रावत जी, सादर प्रणाम! ब्लॉग को पढने व् कमेंट्स करने के लिए सादर आभार! सर!

Vijay Kumar Singhal के द्वारा
January 16, 2014

अच्छी कहानी है. ऐसा रोज देखा जाता है. 

    sanjay kumar garg के द्वारा
    January 16, 2014

    आदरणीय विजय भाई जी, सादर नमन! पहली बार ब्लॉग पर आने व् कमेंट्स करने के लिए सादर आभार!

jlsingh के द्वारा
January 7, 2014

परन्तु, अंकल! आप टिकट कैसे बनायेंगे? नवयुवती बोली। आदरणीय संजय जी, आपने वह विज्ञापन तो देखा ही होगा – अंकल …आप बैठ जाइये और दूसरा नवयुवक कहता है अंकल….भला आदमी अपने बालों को देखता है या किसी तेल का प्रचार होता है…. अब तो अंकल की परिभाषा भी बदल गयी है और दादा की भी हैम आगे बढ़ रहे हैं…हो रहा भारत निर्माण! आपकी लघुकथा अपने उद्देश्य में सफल हुई है! सादर बधाई!

    sanjay kumar garg के द्वारा
    January 9, 2014

    आदरणीय जेएल सर, सादर नमस्कार! कमेंट्स करके मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए हार्दिक आभार! सर!


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