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स्त्री-पुरूष परस्पर 'पूरक' हैं 'प्रतिस्पर्धी' नहीं!

Posted On: 12 Mar, 2014 Others,लोकल टिकेट,social issues में

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”नारी” के संबंध में विभिन्न ग्रन्थों, विचारकों, व दार्शनिकों ने भिन्न-भिन्न व्याख्याएं की हैं। ‘मनुस्मृति’ में जहां नारी को ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ कहा, वही ‘तुलसीदास जी’ ने ‘नारी को ताड़ना का अधिकारिनी बताया’, वही ‘महाभारत’ में स्त्री को पूजन योग्य, भाग्यशाली, गृहप्रकाश, गृहलक्ष्मी आदि कहा गया। एक महान संत ने तो नारी को नरक का द्वार ही मान लिया। आधुनिक विचारकों में ‘महादेवी वर्मा’ का मानना था-”काव्य और प्रेमी दोनों नारी हदय की संपत्ति हैं, पुरूष विजय का भूखा है, तो नारी समर्पण की, पुरूष लूटना चाहता है, नारी लूट जाना।” ‘जेम्स स्टीफन’ ने कहा- “स्त्रियां पुरूषों से अधिक बुद्धिमती होती है, क्योंकि वे पुरूषों से कम जानती हैं, किन्तु उनसे अधिक समझती है।” नारी को छाया मात्र मानने वाले पश्चिमी विचारक ‘चेम्फर्ट’ का मानना था-”नारी पुरूषों की छाया मात्र है, उसको पाने का प्रयास करो तो वह दूर भागती है, यदि उससे पलायन करो तो वह अनुसरण करती है।” विचारक फिलिडग का तो मानना था-”अधिकांश पुरूष नारियों में वह खोजते हैं, जिनका स्वयं उनके चरित्र में अभाव होता है।” ‘महात्मा गांधी’ ने कहा कि “जीवन में जो कुछ पवित्र और धार्मिक है, स्त्रियां उसकी विशेष संरक्षिकाएं है।” ‘किपलिंग’ का तो यहां तक मानना था कि “नारी का अनुमान भी पुरूष के पूर्ण निश्चय सेे कही सत्य होता है।” अंग्रेजी के महान साहित्यकार ‘सेक्सपियर’ ने तो नारी को छलनामयी बताया, वही ‘साइरस’ ने कहा-”नारी या तो प्रेम करती है या फिर घृणा, इसके बीच का कोर्इ मार्ग उसे ज्ञात नहीं।
shiv2नारी व नारीत्व पर अनेक विचार, विचारकों ने व्यक्त किये हैं, उनमें से अधिकतर उसे ‘देवी’ बनाकर सिर पर बैठाना चाहते हैं, या फिर ‘जूती’ समझकर पैरों में पहनना चाहते हैं, उसे पुरुषों के बराबर का दर्जा क्यों नहीं देना चाहते? वास्तव में स्त्री-पुरूष विश्व रूपी अंकुर के दो पत्ते हैं1 स्त्री-पुरूष परस्पर ‘पूरक’ हैं ‘प्रतिस्पर्धी’ नहीं। एक के अभाव में दूसरा अपूर्ण है। दोनों में से कोर्इ भी, अपने आप में सम्पूर्ण नहीं है, सम्पूर्णता के लिए उन्हे एक दूसरे का सहारा अवश्य लेना होगा। अपनी बात के संबंध में, मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं- मैं अपने पडोसी शर्मा जी के पास कुछ काम गया था। उनकी उम्र 60 के आसपास होगी। मैं जब वहां पहुंचा तो अंकल टीवी देख रहे थे और आंटी न्यूज पेपर पढ़ रही थी। अंकल टीवी में कौन आ रहा है, ये आंटी को बता रहे थे। आंटी सीरियल सुन रही थी और न्यूज पेेेपर पढ़ रही थी । तभी वो अंकल से बोली दिल्ली में आप पार्टी पर सम्पादकीय आया है। अंकल ने कहा पढ़ो, तो आंटी ने पूरा सम्पादकीय, सीरियल देख रहे अंकल को सुना दिया।
मैंने उनसे पूछा-अंकल-आंटी आप ये क्या कर रहे हैं?
वे बोले बेटा-कल हमारे पोते अंशु ने हम दोनों के चश्में तोड दिये हैं! हममें से एक का प्लस का नम्बर है दूसरे का माइनस का नम्बर है। अत: में इन्हें अपनी नजरों से टीवी दिखा रहा हूं और ये मुझे अपनी नजरों से पेेपर पढ़ा रही हैं, हम एक दूसरे की आंखे बने हुए हैं। उन्होंने हंसते हुए कहा।

पाठकजनों! क्या अक्सर ऐसा देखने में नहीं आता? पति-पत्नी में एक की ‘पास’ की नजर कमजोर होती है, दूसरे की ‘दूर’ की कमजोर होती है, एक का स्वभाव ‘उग्र’ होता है तो दूसरा थोडा ‘शान्त’ होता है, एक ‘रिजर्व’ होता है दूसरा ‘फ्रेंक’ होता है, एक ‘सुन्दर’ होता है दूसरा अपेक्षाकृत ‘कम सुन्दर’ होता है? ये सब क्या है? क्या ये हमें ‘र्इश्वर’ प्रदत्त उपहार नहीं है, कि एक की न्यूनाधिकता को दूसरा पूर्ण कर देता है?
shiv1वास्तव में एकाकी ‘स्त्री-पुरूष’ अपने आप में अपूर्ण है, पुरूष जहां शारीरिक रूप से सबल है, वही स्त्री मानसिक रूप से मजबूत होती है, पुरूष में द्रष्टि होती है, नारी में अंतद्रष्टि होती है।2 र्इश्वर ने उनकी रचना इस प्रकार की है, कि वे एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं पूरक बन कर रहें। केवल ‘भावी संतति’ सृजन के लिए ही नहीं, वरन उसके पालन पोषण के लिए भी ‘नर-नारी’ एक दूसरे पर आश्रित हैं। स्त्री- पुरू मूल में सम्पृवत हैं। ईश्वर ने अपने आपको दो खण्डों में विभाजित किया, वे दो खण्ड परस्पर पति-पत्नी हो गये।3 भगवान ‘शंकर’ ने ‘अर्धनारिश्वर रूप में तथा अनेक ‘देेेवी-देेेेवताओं’ व ‘अवतारों’ ने “युगल रूप” में अवतरित होकर जनमानस में इसी संदेश को प्रस्तुत किया है। प्रबुद्ध समाज ने भी विवाह जैसी संस्था बनाकर “र्इश्वर” के इसी संदेश को आत्मसात किया तथा नर-नारी को पति-पत्नी के रूप में एक सूत्र में बांधकर सम्पूर्णता प्रदान कर दी। विवाह में पुरूष का जीवन स्त्री की पूर्ति करता है और स्त्री का जीवन पुरूष के जीवन को पूर्ण बनाता है, स्त्री और पुरूष सम्मिलित होकर मानवता को पूर्ण बनाते हैं।4
दो लाइनों के साथ ‘ब्लॉग’ समाप्त करता हूँ-
यूं  तो  जन्म-जन्म का है साथ  हमारा,
हरेक जन्म में मिलेे औेर बिछडे हैं हम।

1.जायसी
2.विक्टर हयूगो
3.वृद्धारण्यक उपनिषद
4.हिप्पेल

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1392 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Della के द्वारा
July 11, 2016

Hello! I just wish to give an enormous thumbs up for the great info you may have appptrriaoe here on this post. I can be coming once more to your weblog for more soon.

yamunapathak के द्वारा
March 22, 2014

संजय जी मुझे यह कभी समझ में नहीं आता कि नारी पर विचार लिखने वाले सभी उद्धरण क्यों नहीं उसे पहले एक मनुष्य मानते हैं भेद क्यों …..आपका आलेख बहुत ही तर्क संगत है …बस अपने-अपने किरदार ही तो मनुष्य निभाता है. साभार

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 22, 2014

    आदरणीया यमुना जी! मैं भी यही कहना चाहता हूँ- “हम नारी को पहले इंसान क्यों नहीं मानते?” समर्थनात्मक कमेंट्स के लिए सादर आभार! आदरणीया यमुना जी!

    Sondi के द्वारा
    July 11, 2016

    Je trouve la dame assez limite dans ses arguments, approximative et assez retho… Elle mixe à mort. En face, le vilain Sarko est assez net sans être too much. Le côté on raccompagne les fonrcionnaites le soir… c’est quand même un peu creux, non? Fraise qu’en dis-tu?

yamunapathak के द्वारा
March 22, 2014

बहुत ही सुन्दर आलेख है ….सबको पढनी चाहिए .कई अंश नोट करने लायक हैं.

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 22, 2014

    आदरणीया यमुना जी, ब्लॉग पर आने के लिए सादर आभार!

    Andralyn के द्वारा
    July 11, 2016

    I have wondered why would people from a faraway hot climate choose to live in the cold dark northern countries. Hmmm. Wonders never cease. “Nearly 300 women have sought help so far this year from Oslo’s emergency clinic handling rape victims. That’s a higher per capita rate than New York City’s, and the clinic is having trouble meeting demand.”I feel so safe here in NYC. Love it. Hello, women in Europe, defend yolresuves! It is not your clothing. Learn how to fight back.

sanjay kumar garg के द्वारा
March 21, 2014

आदरणीय चित्रांश जी, सादर नमन! आपके बारे में पढ़कर अच्छा लगा! वास्तव में परिवार तो प्रथम होना ही चाहिए! उसके पालन पोषण की जिम्मेदारी हमारी ही तो है! जहाँ तक लेख का शीर्षक एक सा होने का प्र्शन है, आप मेरा “मौन” सर्वोत्तम भाषण है!” ब्लॉग अवश्य पढ़िए! आलोचनाये-समालोचनाएँ यदि तार्किक हो तो वास्तव में पसंद की जानी चाहिए! मुझे भी पसंद हैं! ब्लॉग पर पुन आने के लिए पुन सादर आभार चित्रांश जी!

    Jacki के द्वारा
    July 11, 2016

    Li esse seu post e me idneiiftquei com ele. Mas com uma diferença, algo semelhante está para acontecer comigo. Estou prester a deixar o Brasil para embarcar para a Finlândia para visitar o amor da minha vida, fazendo como vc, a namorada virar esposa e o país passar a ser minha nova casa!

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 20, 2014

    आदरणीय योगी जी, सादर नमन! बहुत दिनों बाद आपके बहुमूल्य विचार पढ़ने को मिले हैं, उसके लिए हार्दिक आभार योगी जी! अपना हार्दिक सहयोग व् मार्गदर्शन बनाये रखें! धन्यवाद!

    Dayana के द्वारा
    July 11, 2016

    That’s really thkiinng of the highest order

Charchit Chittransh के द्वारा
March 16, 2014

आपने जैसे मेरे विचारों को ही श्रंखला वद्ध कर प्रस्तुत कर दिया है…. सभी प्रसिद्ध विचारकों के विचार प्रासंगिक हैं… …..ये सब क्या है? क्या ये हमें ‘र्इश्वर’ प्रदत्त उपहार नहीं है, कि एक की न्यूनाधिकता को दूसरा पूर्ण कर देता है?……उसे पुरुषों के बराबर का दर्जा क्यों नहीं देना चाहते?…. वास्तविकता जरा सी हटकर अवश्य है- जैसा आपने भी लिखा है  हनारे पौराणिक इतिहास में सदैव जोड़े में दोनों समानता से पूज्य उल्लेखित हैं… आज की नारी भी समानता पर ही है….  उसका संघर्ष समानता का है ही नहीँ वरन विशिष्टता का है…. और वह वैशिष्ट्य पा भी लेगी…. क्योंकि हम सब ऐसा ही चाहते हैं…. वैसे एक आध्यात्मिक और वैज्ञानिक प्रमाणिक तथ्य यह है कि संसार का प्रत्येक मनुष्य  आज भी अर्धनारीश्वर ही है… विचारों से किसी में स्त्रीत्व का आधिक्य है तो किसी में पुरुषत्व का….

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 19, 2014

    आदरणीय चित्रांश जी, सादर नमन! ब्लॉग पर आने व् सकारात्मक कमेंट्स करने के लिए सादर आभार!

    Charchit Chittransh के द्वारा
    March 20, 2014

    मेरे सामने सर्वप्रथम दायित्व परिवार का भरण-पोषण है…. जिसके लिये एक शासकीय वित्तीय कंपनी में बँधुआ अधिकारी हूँ… सितं. 2011 से सुबह 10 से रात 11 का कार्यालयीन रूटीन है…. बस तभी से लिखास और पढ़ास दोनों कठिनतर हो गये हैं …. बहुत याद आता है जाज मंच के साथियों का सहयोग… आपके लेख का शीर्षक मेरी किसी पूर्व टिप्पणी के समरूप सा लगा …. आपको पढ़ा… समालोचना मेरी प्रियतम विधा है… वही की है… जय-हिन्द  

    Shirley के द्वारा
    July 11, 2016

    You are so awesome for helping me solve this myetrsy.

sanjay kumar garg के द्वारा
March 15, 2014

आप सभी को रंग – बिरंगी होली की हार्दिक शुभकामनाएं !

    Keyaan के द्वारा
    November 5, 2016

    spiller du poker? Og sÃ¥ har du ikke invitert meg? Jaja, skjønner jo at du kan være redd for isdronningens poseefjek…heheJrg gjemmer meg i hvert fall ikke _under_ bordet ; D(kom du deg trygt over gata forresten? Noen erfaringer rikere?)

vaidya surenderpal के द्वारा
March 15, 2014

सार्थक और विचारणीय आलेख….।

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 15, 2014

    आदरणीय विद्या जी! सादर नमन! ब्लॉग पर आने व् कमेंट्स करने के लिए सादर आभार!

ranjanagupta के द्वारा
March 15, 2014

भाई संजय जी !इतना सुन्दर सार गर्भित मंथन के लिए बधाई !!बहुत सुन्दर लेख !!

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 15, 2014

    आदरणीया दीदी, सादर नमन! आलेख को पसंद करने व् अपने भाई को हार्दिक बधाई देने के लिए सादर धन्यवाद दीदी!

    Gerry के द्वारा
    July 11, 2016

    pretty ints&estingr#8230;Blees you in the a new challenge you have got exposed inside your article. A single thing I’d like to help you reply to is without a doubt which will FSBO interactions are designed with time. As a result of bringing out you to ultimately owners the be…

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 15, 2014

नारी पुरुष की पूरक  है प्रतिद्वंदी नहीं ,पुरुष के पास द्रष्टि है नारी के पास अंतर द्रष्टि ,संजय जी बहुत बधाई ,स्त्री पुरुष के सम्बन्धों का इतना पवित्र ,सर्गार्वित एवं सटीक विश्लेषण प्रस्तुत करने के लिए ,सादर आभार

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 15, 2014

    आदरणीया निर्मला जी, सादर नमन! आपको लेख पसंद आया, उसके लिए धन्यवाद! आलेख को पढने व् कमेंट्स करने के लिए सादर आभार ! आदरणीया निर्मला जी!

sadguruji के द्वारा
March 13, 2014

आदरणीय संजयजी,इस बहुत अच्छे लेख के लिए बहुत बहुत बधाई,सुबह दैनिक जागरण में कुछ अंश पढ़ा था.ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं-shiv2नारी व नारीत्व पर अनेक विचार, विचारकों ने व्यक्त किये हैं, उनमें से अधिकतर उसे ‘देवी’ बनाकर सिर पर बैठाना चाहते हैं, या फिर ‘जूती’ समझकर पैरों में पहनना चाहते हैं, उसे पुरुषों के बराबर का दर्जा क्यों नहीं देना चाहते? वास्तव में स्त्री-पुरूष विश्व रूपी अंकुर के दो पत्ते हैं।1 स्त्री-पुरूष परस्पर ‘पूरक’ हैं ‘प्रतिस्पर्धी’ नहीं। एक के अभाव में दूसरा अपूर्ण है। दोनों में से कोर्इ भी, अपने आप में सम्पूर्ण नहीं है, सम्पूर्णता के लिए उन्हे एक दूसरे का सहारा अवश्य लेना होगा।

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 13, 2014

    आदरणीय सद्गुरू जी, सादर नमन! आपका प्रोत्साहन मेरा उत्साह बढ़ाता हैं, कुछ अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करता हैं! ब्लॉग पर आने के लिए सादर आभार, सद्गुरु जी!

    Melia के द्वारा
    July 11, 2016

    One look at Rob Buckley and you can see that talent isn't the only thing he's got going for him – Oh my, yes. (!) I’m glad he peeervsred!

Alka के द्वारा
March 13, 2014

संजय जी , सम्पादकीय पेज पर आने के लिए आपको बधाई . सुन्दर और विचारणीय आलेख | पुनः बधाई ..

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 13, 2014

    आदरणीया अलका जी, सादर नमन! बधाई के लिए सादर धन्यवाद, व् ब्लॉग को पढ़ने के लिए आभार! अपने बहुमूल्य सुझावों से मार्गदर्शन करते रहें!

    Armena के द्वारा
    July 11, 2016

    What’s puritanical about it?And why are you concerning yourself with your assumptions of his ‘unrealized suppressed sexual urges”?I’m guessing you don’t know what &#1rc6;pu2itani1al  means and that you have something suppressed issue going on which explains your detacted response.

sanjay kumar garg के द्वारा
March 13, 2014

आज सम्पादकीय पेज पर मेरे ब्लॉग को स्थान देने के लिए संपादक महोदय व् उनकी टीम का हार्दिक धन्यवाद व् आभार!

    Latricia के द्वारा
    July 11, 2016

    Taking the ovewriev, this post hits the spot

jlsingh के द्वारा
March 12, 2014

बहुत ही सुन्दर आलेख आदरणीय संजय गर्ग जी! चिंतनीय, मननीय, अनुकरणीय!

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 13, 2014

    आदरणीय जेएल सर, सादर नमन! लेख को पढ़ने व् पसंद करने के लिए सादर आभार ! दिशानिर्देशन बनायें रखें! धन्यवाद सर!

    Bubi के द्वारा
    July 11, 2016

    Thanks for your thgthous. It’s helped me a lot.

March 12, 2014

सार्थक प्रस्तुति .आभार

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 13, 2014

    आदरणीया शालिनी जी, सादर नमन! ब्लॉग पर आने व् कमेंट्स करने के लिए सादर आभार!

    Justus के द्वारा
    July 11, 2016

    Ben, wow, I have not seen you in a while. You have grown up nicely and so hadseomn. Great pictures! Best of luck with your Senior Year!

deepak pande के द्वारा
March 12, 2014

बहुत खूब संजय जी ज्ञान वर्द्धक रचना

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 12, 2014

    आदरणीय दीपक जी, सादर नमन! ब्लॉग पर आने व् कमेंट्स करने के लिए सादर आभार!

    Nona के द्वारा
    July 11, 2016

    Wouredfnl site layout! I’m happy when I read a terrific article on the world wide web. Thanks for sharing and I hope you will publish more amazing stuff in the future.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 12, 2014

सुन्दर और सारगर्वित आलेख ! नारी के वगैर संसार की कल्पना ही नहीं की जा सकती ! बधाई ! गर्ग जी !!

    sanjay kumar garg के द्वारा
    March 12, 2014

    आदरणीय आचार्य जी, सादर नमन! आलेख पढ़ने व् कमेंट्स करने के लिए सादर आभार व् धन्यवाद! अपना हार्दिक सहयोग व् मार्गदर्शन बनाये रखें!


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