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धरती की गोद

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ऊबकाई (लघु कथा)

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हाँ! जी खाना लग गया है! आ जाईये! रोहित की पत्नि ने रोहित को आवाज लगाई!
रोहित आकर खाना खाने लगा।
तभी उसके दो साल के बेटे ने पोट्टी (लेट्रीन) कर ली। रोहित को पता चलते ही ऊबकाई आने लगी और वह ऊबकाई लेता हुआ तेजी से वाॅशवेसन की ओर दौड़ पड़ा।
रोहित की यह एक ‘‘मनोवैज्ञानिक‘‘ समस्या थी, उसके खाते समय यदि कोई अभक्ष्य या गन्दगी की बात भी करता तो उसे ऊबकाई आने लगती थी और उल्टी हो जाती थी। रोहित और उसके परिवार वाले इस बात से बहुत परेशान थे। काफी इलाज कराने के बाद भी उसे लाभ नहीं हो पा रहा था।
रोहित किसी आवश्यक कार्य से शहर से बाहर गया हुआ था, वापस लौटते समय वह लघु शंका के लिए एक सुलभ शौचालय में गया। निवृत्त होकर जैसे ही वह वापस लौट रहा था, तभी उसे आवाज आयी।
‘‘एक रोटी और लीजिए?‘‘ उसके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा, भोजन, वो भी शौचालय में?
वह आवाज की दिशा में गया तो उसने देखा, शौचालय के अन्दर ही एक ओर मेहतरानी खाना बना रही थी और मेहतर खाना खा रहा था। उसका मुंँह आश्चर्य से खुला रह गया।
वह सोचते-सोचते बस में आकर बैठ गया। अब रोहित समझ गया था, उसकी ‘‘ऊबकाई‘‘ एक मानसिक समस्या है, मन को सकारात्मक सुझाव देकर इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। उसके चेहरे पर एक आत्मविश्वास की चमक थी, उस दिन से उसकी वह ‘‘मनोवैज्ञानिक‘‘ समस्या धीरे-धीरे दूर होने लगी थी।

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192 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Veer Suryavanshi के द्वारा
June 16, 2014

एक विचार पूर्ण व् शिक्षाप्रद लेख !! एक बार ये भी पढ़े http://veersuryavanshi.jagranjunction.com/2014/06/12/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be/?preview=true&preview_id=753722&preview_nonce=73f030ef02

    sanjay kumar garg के द्वारा
    June 18, 2014

    आदरणीय वीर जी, सादर नमन! ब्लॉग पर आने व् कमेंट्स करने के लिए सादर धन्यवाद! आपका दिया हुआ लिंक नहीं खुल रहा है? अपनी पोस्ट का दूसरा लिंक अवश्य भेजें!

yogi sarswat के द्वारा
June 16, 2014

संजय जी ये समस्या मुझे भी है ! कोशिश करूँगा की आपके बताई बात का अनुसरण कर सकूँ और इस “मनोवैज्ञानिक ” रोग से छुटकारा पा सकूँ !

    sanjay kumar garg के द्वारा
    June 18, 2014

    आदरणीय योगी जी, सादर नमन! ये समस्या आम है, बहुत भारतीय, विशेषकर हिन्दू इस समस्या से पीड़ित रहतें है, इस समस्या से हम मनोवेज्ञनिक तरीके से आसानी से छुटकारा पा सकते हैं! ब्लॉग पर आने व् कमेंट्स करने के लिए सादर आभार! योगी जी!

Sushma Gupta के द्वारा
June 15, 2014

उबकाई के द्वारा संजय ji आपने मानव को जो सकारात्मक सन्देश दिया है , बह प्रसंसनीय है..वधाई..

    sanjay kumar garg के द्वारा
    June 16, 2014

    आदरणीया सुषमा जी, सादर नमन! ब्लॉग पर आने व् कमेंट्स करने के लिए सादर धन्यवाद!

    Letitia के द्वारा
    July 11, 2016

    Ã…h vad roligt att ni är igÃ¥ng nu, grattis till finfin sida! Ser fram emot att hänga här varje dakÃSg.¶t om dig!Kram Mikaela

    Dillian के द्वारा
    July 11, 2016

    cosmica; Agfa; Prietenie; Elefantelul curios; Flamingo (si altele … MUST SEE!!); Pants down; Sageata timpului; Related Porte:Miercussa fără cuvinte – dii, peÈ™tiÈ™orule, dii!Miercurea fără cuvinte

jlsingh के द्वारा
June 14, 2014

बहुत सुन्दर laghukataha shri sanjay garg ji!

    sanjay kumar garg के द्वारा
    June 16, 2014

    आदरणीय जे एल सर, सादर नमन! ब्लॉग पर आने व् कमेंट्स करने के लिए सादर धन्यवाद!

    Trisha के द्वारा
    July 11, 2016

    No es supercerdo, de Shin Chan. Tampoco Porco Rosso… Cuanto cerdo de dibujos. Pero yo me refería al cerdo más cerdo de todos los cerdos del anime nipi.n³VÃcky, se llamaba Oolong. Y lo ha acertado Oneeyedman. Enhorabuena.

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
June 14, 2014

संजय जी तितल मैं उबकाई ,लेख मैं उबकाई ,किन्तु भावों मैं दार्शनिकता सब ठीक हो गया ओम शांति शांति

    sanjay kumar garg के द्वारा
    June 16, 2014

    आदरणीय हरिश्चंद्र जी, सादर नमन! आप की दार्शनिक भाषा मुझे कम समझ आती है! ब्लॉग पर आने व् कॉमेंट्स करने के लिए सादर आभार!

    Joni के द्वारा
    July 11, 2016

    I told my kids we’d play after I found what I neeedd. Damnit.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 12, 2014

साफ़ सुथरा रहना जरूरी है पर कई लोगों को सफाई की मानसिक बीमारी हो जाती है ,दिशा दिखाती लघु कथा संजयजी ,हार्दिक बधाई .

    sanjay kumar garg के द्वारा
    June 13, 2014

    आदरणीया निर्मला जी! सादर नमन! ब्लॉग पर आने व् कमेंट्स करने के लिए सादर धन्यवाद!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 12, 2014

बहुत ही सुन्दर मनोवैज्ञानिक लघुकथा ! गर्ग जी बधाई !!

    sanjay kumar garg के द्वारा
    June 13, 2014

    आदरणीय विजय जी, सादर नमन! ब्लॉग पर आकर मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए हार्दिक धन्यवाद! आचार्यवर!

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
June 11, 2014

अद्भुत रचना .आभार

    sanjay kumar garg के द्वारा
    June 12, 2014

    कमेंट्स करने के लिए आभार! आदरणीया शिखा जी!

deepak pande के द्वारा
June 10, 2014

आदरणीय संजय जी कमाल की रचना इस प्रकार की लघु कथाएँ तो समाज से कई प्रकार की मानसिक बीमारियां दूर करने में सक्षम हैं सादर आभार

    sanjay kumar garg के द्वारा
    June 11, 2014

    आदरणीय दीपक जी, सादर नमन! लघु कथा को पढ़ने व् कमेंट्स करने के लिए सादर धन्यवाद!

sadguruji के द्वारा
June 10, 2014

आदरणीया संजय जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! बहुत शिक्षाप्रद लघुकथा है ! आपकी लघुकथा से मुझे उन ऐसी महिलाओं की याद आ गई,जो खाना खाती हैं और बच्चा लैट्रिन कर देता है ! वो बच्चे की लैट्रिन साफ कर हाथ धोती हैंऔर फिर खाना खाना शुरू कर देती हैं ! धन्य है माँ ! इस रचना के लिए बहुत बहुत बधाई !

    sanjay kumar garg के द्वारा
    June 10, 2014

    आदरणीय सद्गुरू जी, सादर नमन! आपकी बात बिलकुल ठीक है, जहां महिलायें बच्चे को पोट्टी करके, हाथ धो कर फिर से खाना प्रारंभ कर देती हैं! वही अनेक पुरूष खाना खाना छोड़ देते हैं! धन्य है माँ! त्वरित कमेंट्स करके उत्साह बढ़ाने के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय सद्गुरू जी!


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