social issu

धरती की गोद

30 Posts

20366 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 5503 postid : 764205

बलवान बनो!! (लघु कथा)

  • SocialTwist Tell-a-Friend

‘भावना’ ‘कुतर्क’ के सामने हार गईं थी, क्योंकि वो अपनी ‘ईश्वर’ रूपी ‘भावना’ को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पायीं थीं। ‘कुतर्क’ जोर-जोर से अटठ्हास कर रहे थे।
कहां है तुम्हारा “ईश्वर” बुलाओ? नही तो शर्त के अनुसार अपनी चोटी-जनेऊ काट डालो!
ये ‘कलिकाल’ का शास्तार्थ था। पूरा सभागार ठहाकों से गूंज रहा था।
दिन छिपने लगा, मंदिरों की घंटियां बजने लगी, ‘भावना’ पूजा को उद्यत होने लगीं, वही सभागार में मदिरा के भरे गिलास आपस में टकराने लगे।
असुरी, सुरा, ‘कुतर्क’ के सर चढ़कर बोलने लगी। चोटी-जनेऊ से खेला जाने लगा। आज द्रोपदी रूपी ‘भावना’ की इज्जत बचाने भगवान आएंगें?
कहां है तुम्हारा “कृष्ण” !! हां हां!! बुलाओ?
ईश्वर के ध्यान में लीन, ‘भावना’ रूपी ‘विद्धानों‘ की आंखों से आंसू बह रहे थे!!
तभी अचानक पांच भीमकाय पहलवान सभागार में प्रवेश करते हैं, और मामला समझते ही चिल्लाते हैं-”इस कलयुग में भगवान नहीं आते, बन्दे आते हैं!” दुष्टों!! और कहकर एक ‘कुतर्क’ के मुंह पर मुक्का जड़ देते हैं, अन्य ‘कुतर्क’ भागने लगते हैं, उन पर भी मुक्कों की बरसात होने लगती है!
कौन है? माई का लालऽऽऽ? जो इन विद्धानों की चोटी-जनेऊ काटने की शक्ति रखता हो? पूरा सभागार उनकी आवाज से थर्रा उठा। सभागार में भगदड़ मच गई। उनका सामना करने के लिए कोई ‘कुतर्क’ तैयार नहीं था।
‘पांचों’ उन ‘विद्वानों’ को सभागार से लेकर बाहर की ओर चल दिये।
वेदों में कहा गया है-‘‘बलंवाव भूयोऽपि ह शतं विज्ञानवतामेको बलवाना कम्पयते‘‘ अर्थात बलशाली बनो, एक बलशाली सौ विद्धानों को कंपा देता है! -संजय कुमार गर्ग

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

169 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 18, 2014

तभी अचानक पांच भीमकाय पहलवान सभागार में प्रवेश करते हैं, और मामला समझते ही चिल्लाते हैं-”इस कलयुग में भगवान नहीं आते, बन्दे आते हैं!” दुष्टों!! और कहकर एक ‘कुतर्क’ के मुंह पर मुक्का जड़ देते हैं, अन्य ‘कुतर्क’ भागने लगते हैं, उन पर भी मुक्कों की बरसात होने लगती है! अच्छे उदाहरन से  आपने बखूबी समझा दिया ,सही गलत का भेद ,अनोखा सुंदर आलेख संजय जी ,हार्दिक बधाई .

    sanjay kumar garg के द्वारा
    July 19, 2014

    आदरणीय निर्मला जी, सादर नमन! लघु कथा को पढने व् सुन्दर सा कमेंट्स देने के लिए हार्दिक आभार!

deepak pande के द्वारा
July 18, 2014

वाह संजय जी इश्वर तो केवल मदद करता है प्रयास तो स्वयं करना पड़ता है बलवान बनकर सुन्दर सन्देश दिया है

    sanjay kumar garg के द्वारा
    July 19, 2014

    आदरणीय दीपक जी! सादर नमन! आपको कथा अच्छी लगी उसके लिए सादर धन्यवाद!

    Trix के द्वारा
    July 11, 2016

    I read your post and wisehd I was good enough to write it

sadguruji के द्वारा
July 18, 2014

आदरणीय संजय जी ! सादर अभिनन्दन ! इस उत्कृष्ट लघुकथा के लिए बधाई ! ईश्वर शास्त्रार्थ के द्वारा दृष्टिगोचर नहीं होता है,बल्कि वो तो मन का सब शास्त्रार्थ बंद होने के बाद दर्शन देता है ! एक नया विषय चुनने के लिए बधाई !

    sanjay kumar garg के द्वारा
    July 18, 2014

    आदरणीय सद्गुरू जी, सादर नमन! वास्तव में “ईश्वर मन का सब शास्त्रार्थ बंद होने के बाद दर्शन देता है !” ब्लॉग पर त्वरित व् प्रेरित कमेंट्स करने के लिए सादर आभार!

Sushma Gupta के द्वारा
July 18, 2014

संजय जी, एक अति प्रेरक एवं श्रेष्ट लघु-कथा पढ़ने का सौभाग्य मिला, इस हेतु आपका आभार..

    sanjay kumar garg के द्वारा
    July 18, 2014

    आदरणीय सुषमा जी, सादर नमन! ब्लॉग पर आने व् कमेंट्स करने के लिए सादर आभार!


topic of the week



latest from jagran